पीयूष मुनि महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर से सर्वोच्च आध्यात्मिक संवत्सरी पर्व की आराधना के तहत अपने संदेश में कहा कि एक वर्ष के पश्चात आने वाली तिथि जब साधक आत्मनिरीक्षण कर मन, वचन तथा शरीर द्वारा लगे दोषों के लिए प्रायश्चित और पश्चाताप करता है संवत्सरी कही जाती है। इस दिन विशेष रूप से आध्यात्मिक साधनाएं की जाती हैं तथा बाहरी प्रवृत्तियों से निवृत्ति लेकर आत्म चिंतन एवं मनन किया जाता है।
साधक आत्मलीन होकर निश्चल चित्त से साधनाएं करता है। अपने से नाराज हुए लोगों से क्षमा मांगकर मैत्री के मीठे संबंध स्थापित करना तथा वैर-विरोध को छोड़ना इस पर्व का उद्देश्य है। यह दिन परम पावन और पुनीत है। यह पर्व स्वयं नहीं चला बल्कि भगवान महावीर ने स्वयं इसका प्रारंभ किया। चातुर्मास के पचास दिन बीतने और सत्तर दिन शेष रह जाने पर संवत्सरी पर्व की आराधना प्रभु महावीर ने की थी। किसी वंश के पूर्वज किसी महान कार्य के लिए कोई दिन नियत कर दें तो सदा के लिए उस दिन का महत्त्व माना जाता है तो सर्वज्ञ, सर्वदर्शी प्रभु के द्वारा निश्चित इस पर्व के महत्त्व को भी आसानी से समझा जा सकता है।
तप-त्याग के द्वारा आत्मिक बल बढ़ाया जाता है
मुनि ने कहा कि वर्तमान समय में संवत्सरी महापर्व के पहले के सात दिनों को भी इसके साथ जोड़ा गया है ,जबकि शास्त्रों में यह सिर्फ एक दिन का ही नियत है। पहले के सात दिन आज के संवत्सरी पर्व की आराधना की तैयारी के समझने चाहिए, जिनमें राग-द्वेष, विषय-विकार आदि पर विजय पाने का प्रयत्न किया जाता है। इन दिनों अहिंसा, संयम, तप-त्याग के द्वारा आत्मिक बल बढ़ाया जाता है ताकि विकारों को दबाया जा सके।
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from KAPS Krishna Pandit

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