मन्दसौर - चंद्रपुरा में चल रही सात दिवसीय शिव महापुराण में शिवरात्रि के महापर्व पर शिव पार्वती विवाह हुआ , पूरा चंद्रपुरा शिव भक्तिमय हो गया, श्रद्धालुओं द्वारा भगवान का पूजन अर्चन कर विधिवत रूप से कन्यादान किया और नाचते - झूमते हुए शिवमहापुराण का आनंद लिया। जिसमे कथावाचक पंडित श्री शर्मा ने बताया कि दक्ष के बाद सती ने हिमालय के राजा हिमवान और रानी मैनावती के यहां जन्म लिया। मैनावती और हिमवान को कोई कन्या नहीं थी तो उन्होंने आदिशक्ति की प्रार्थना की। आदिशक्ति माता सती ने उन्हें उनके यहां कन्या के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। दोनों ने उस कन्या का नाम रखा पार्वती। पार्वती अर्थात पर्वतों की रानी। इसी को गिरिजा, शैलपुत्री और पहाड़ों वाली रानी कहा जाता है। माना जाता है कि जब सती के आत्मदाह के उपरांत विश्व शक्तिहीन हो गया। उस भयावह स्थिति से त्रस्त महात्माओं ने आदिशक्तिदेवी की आराधना की। तारक नामक दैत्य सबको परास्त कर त्रैलोक्य पर एकाधिकार जमा चुका था। ब्रह्मा ने उसे शक्ति भी दी थी और यह भी कहा था कि शिव के औरस पुत्र के हाथों मारा जाएगा। शिव को शक्तिहीन और पत्नीहीन देखकर तारक आदि दैत्य प्रसन्न थे। देवतागण देवी की शरण में गए। देवी ने हिमालय (हिमवान) की एकांत साधना से प्रसन्न होकर देवताओं से कहा- ‘हिमवान के घर में मेरी शक्ति गौरी के रूप में जन्म लेगी। शिव उससे विवाह करके पुत्र को जन्म देंगे, जो तारक वध करेगा।’ भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने देवर्षि के कहने मां पार्वती वन में तपस्या करने चली गईं। भगवान शंकर ने पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेजा। सप्तऋषियों ने पार्वती के पास जाकर उन्हें हर तरह से यह समझाने का प्रयास किया कि शिव औघड़, अमंगल वेषभूषाधारी और जटाधारी है। तुम तो महान राजा की पुत्री हो तुम्हारे लिए वह योग्य वर नहीं है। उनके साथ विवाह करके तुम्हें कभी सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो। अनेक यत्न करने के बाद भी पार्वती अपने विचारों में दृढ़ रही। उनकी दृढ़ता को देखकर सप्तऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती को सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद दिया और वे पुन: शिवजी के पास वापस आ गए। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति दृढ़ प्रेम का वृत्तान्त सुनकर भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न हुए और समझ गए कि पार्वती को अभी में अपने सती रूप का स्मरण है। सप्तऋषियों ने शिवजी और पार्वती के विवाह का लग्न मुहूर्त आदि निश्चित कर दिया। इस अवसर पर जिसमें नरेंद्र धनोतिया वरिष्ठ पत्रकार ,शेलेन्द्र गिरी गोस्वामी पुजारी ओखबावजी मंदिर, राजेश सोलंकी ,डॉ. राघवेंद्र सिंह तोमर, पंडित मनोज शर्मा, पंडित ज्वालाप्रसाद शर्मा, मनोज सोलंकी, गोवर्धन लाल परमार ,बाबूलाल माली ,पीयूष गौतम, नरेंद्र सिंह तोमर ,नरेंद्र सिंह चौहान, नरेंद्र भदोरिया, हुकुम सिंह तोमर, अनवर भदोरिया, राजा ठाकुर, पृथ्वीराज तोमर ,डॉक्टर दिनेश गौड़, पार्षद श्रीमती संगीता गोस्वामी , श्रीमती मंगला धनोतिया, आरती चौहान, श्रीमती सुगनदेवी सोलंकी आदि माताएं बहने पुरुष उपस्थित थे

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