इस व्रत में 17 धागे, 17 दिन और 17 गांठ का बड़ा महत्व है. महाव्रत में व्रती 17 दिन तक अन्न का त्याग करते हैं. फलाहार भी एक वक्त किया जाता है. यह महाव्रत महिला और पुरुष दोनों ही कर सकते हैं.
मां अन्नपूर्णा का दरबार
व्रत अनुष्ठान के लिए महिलाएं बाएं और पुरुष दाएं हाथ में 17 गाठों वाला धागा बांधते हैं. मां अन्नपूर्णा मंदिर के महंत शंकर पुरी बुधवार सुबह 17 गांठों वाले धागे का पूजन कर अपने हाथों से भक्तों में वितरण करेंगे. इस पवित्र धागे के लिए भक्तों की लंबी कतार सुबह से ही लगी रहेगी.
मां अन्नपूर्णा की प्रतिमाकाशी रहस्य में अन्नपूर्णा महाव्रत का वर्णन'अहो भवानी सदने निषीदतां प्रदक्षिणी कृत्य तथा यथा सुखम, न तत्सुखं योग-यागादि साध्यं अंबापुर: प्राण भृपदाति.'- अर्थात जो सुख योग आदि से भी प्राप्त नहीं है. वो भगवती अन्नपूर्णा के मंदिर में जाकर बैठने वालों और मंदिर की पैदल प्रदक्षिणा करने वालों को प्राप्त हो जाती है. 24 नवंबर से 17 दिनों का अन्नपूर्णा महाव्रत
पूर्वांचल के किसान फसल की पहली धान की बाली मां को अर्पित करते हैं. उसी बाली को प्रसाद के रूप में दूसरी धान की फसल में मिलाते हैं. वो मानते हैं कि इससे फसल में बढ़ोतरी होती है. महंत शंकर पुरी ने कहा मां अन्नपूर्णा का व्रत-पूजन दैविक, भौतिक सुख प्रदान करता है. अन्न-धन, ऐश्वर्य की कमी नहीं होती है. अन्नपूर्णा महाव्रत की कथा का उल्लेख भविष्योत्तर पुराण में मिलता है. महाव्रत का वर्णन त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने किया था, द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने भी इससे संबंधित उपदेश दिए थे.

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