
नई दिल्ली । मोदी सरकार नार्वे के सहयोग से देश के समुद्री क्षेत्रों में छोटे आकार की ‘क्रिल मछलियों’ को पकड़ने (क्रिल फिशिंग) की संभावना तलाश रही है।इस विषय पर नीति आयोग के माध्यम से प्रस्ताव तैयार किया गया है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधिकारी ने बताया,क्रिल फिशिंग की संभावना के विभिन्न पहलुओं पर पिछले कुछ वर्षों में विचार किया है। इस विषय पर तैयार मसौदा पत्र पर मंत्रिमंडल सचिवालय ने विचार कर कुछ सुझाव भी दिए।उन्होंने बताया कि इसके आधार पर क्रिल मछलियों को पकड़ने के संबंध में नार्वे से सहयोग की संभावना को लेकर नीति आयोग के सहयोग से प्रस्ताव तैयार किया गया है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) में भी कहा गया है कि क्रिल फिशिंग को समर्थन देने की संभावना तलाशी जा रही है।
गौरतलब है कि क्रिल छोटे आकार के क्रस्टेशिया प्राणी हैं, जो विश्व-भर के सागरों-महासागरों में मिलते हैं। समुद्र में क्रिल खाद्य शृंखला की सबसे निचली श्रेणियों में आती हैं। क्रिल समुद्र, नदियों, झीलों में तैरने वाले सूक्ष्मजीव प्लवक (प्लैंक्टन) खाते हैं, और फिर व्हेल, पेंगविन, सील जैसे बड़े आकार के समुद्री प्राणी क्रिल को खाते हैं। क्रिल तेजी से प्रजनन करके फिर अपनी संख्या की पूर्ति करते रहते हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, क्रिल फिशिंग को लेकर सबसे पहले अगस्त 2014 में प्रस्ताव आया था। इसमें कहा गया था कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और विदेश मंत्रालय मिलकर क्रिल फिशिंग को लेकर विभिन्न देशों के अनुभवों का अध्ययन करे, ताकि उनके अनुभवों से सीखा जा सके। प्रस्ताव में कहा गया था कि उन संभावित देशों की पहचान होगी, जिससे भारत क्रिल फिशिंग को लेकर सहयोग कर सकता है तथा अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुरूप विधान तैयार कर सकता है। क्रिल फिशिंग को लेकर मंत्रालय की प्रस्तावित कार्य योजना के अनुसार, इस विषय पर जापान और नार्वे की विशेषज्ञता है और इनके अनुभवों के बारे में जानकारी जुटायी गई है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय क्रिल फिशिंग में रूचि को लेकर भारतीय उद्योगों के रुझान के बारे में जानकारी जुटा रहा है।
उल्लेखनीय है कि क्रिल मछलियां दिन के समय समुद्र में अधिक गहराई पर चली जाती हैं और रात्रि में सतह के पास आ जाती हैं।इस कारण से सतह और गहराई दोनों पर रहने वाली प्रजातियां इन्हें खाकर पोषित होती हैं। मत्स्य उद्योग में क्रिल बड़ी संख्या में दक्षिणी महासागर और जापान के आसपास के सागरों में पकड़ी जाती हैं। पकड़ी गई क्रिल का अधिकांश हिस्सा मछली पालन में मछलियों को खिलाने में किया जाता है। इसका कुछ अंश औषधि उद्योग में भी इस्तेमाल होता है।

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